क्या है शिवरात्रि,और क्यूँ करते है शिवरात्रि व्रत

:-शिवरात्रि के व्रत से प्राप्ति:-

शिवरात्रि दो शब्दों के संयोग से बना हुआ है शिव+रात्रि,अर्थात शिव की रात्रि।फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले इस महान रात्रि को शिव की रात्रि की संज्ञा दी गयी है।वैसे तो हर मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि होती है,परन्तु फाल्गुन मास में पड़ने वाले इस शिवरात्रि की विशेष प्रधानता है,कहते हैं कि सृष्टि का आरम्भ इसी दिन से हुआ था और कहा जाता है कि शिव और पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था।

शिवरात्रि के पावन अवसर पर हर वर्ग इस व्रत को करता है,पत्नियाँ इस व्रत को धारण कर अपने पति के दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना करती हैं,और कुवारी कन्यायेँ इस व्रत को करके अपने मनोनुकूल वर की प्राप्ति करती हैं।स्कंदपुराण में तो यहा तक कहा गया है कि शिवरात्रि उत्तम से भी उत्तम है,जो भक्ति भाव से इशों के ईश शिव का पूजन नहीं करते हैं वह सहस्त्र जन्म तक इस 84 लाख योनियों में भ्रमण करते रहते हैं।भगवान शिव कहते है कि जो मेरे भक्त शिवरात्रि व्रत करते हैं उनको सदा के लिए श्रेष्ठगण बना लेता हूँ,यह व्रत शिव की शिक्षा है,व्रती सब भोगों को भोगकर मुक्ति की प्राप्ति करता है।

ईशानसंहिता में लिखा गया है कि शिवरात्रि का व्रत सब पापों का नाश करने वाला है,चांडाल तक को भुक्ति मुक्ति का दाता है,इसमें जागरण व्रत पूजा एकत्र होकर करनी चाहिये।जो मनुष्य अखण्डितव्रत होकर शिवरात्रिव्रत करता है,वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करके,शिव जी के साथ परम आनन्द को भोगता है।