प्रवर क्या है?

:-प्रवर से अभिप्राय:-

पिछले लेख में हम लोगों ने जाना कि गोत्र से क्या अभिप्राय है।आज गोत्र के अन्तर्गत प्रवर से अभिप्राय क्या है इसको जानेंगे।

गोत्रों का प्रवर से घनिष्ठ संबंध है।प्रवर का अर्थ है “श्रेष्ठ“।प्रवर  गोत्र के प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद में होने वाले महान व्यक्तियों की ओर संकेत करता है।प्रवर उन ऋषियों के नाम होते हैं जो वैदिक,नित्य नैमित्तिक कर्म एवं कुलाचार के प्रवर्तक है।

प्रवर के सन्दर्भ में कहा गाय कि प्रवर उतना पुराना नहीं जितना गोत्र।इससे स्पष्ट है कि गोत्र के मूल प्रवर्तक ऋषियों के बाद उनके बाद के महान व्यक्ति है।

प्रवर तीन या पाँच हैं,पाँच प्रवर वाले तीन प्रवर वालों से श्रेष्ठ हैं।

पाँच प्रवरवाले यज्ञोपवीत के ब्रह्मपाश में पाँच लपेटे वाला यज्ञोपवीत धारण करते हैं,वहीं तीन प्रवर वाले यज्ञोपवीत के तीन लपेटों से निर्मित ब्रह्मपाश वाला यज्ञोपवीत धारण करते हैं।

जैसे-गर्ग गोत्र वाले पाँच प्रवर वाले हुये,अर्थात गर्ग गोत्र में गर्ग ऋषि के बाद पाँच महान ऋषि हुये-आंगिरस,वार्हस्पत्य,भारद्वाज,श्येन और गार्ग्य-

और गौतम गोत्र वाले तीन प्रवर वाले हुये,इनमें अंगिरस,वार्हस्पत्य और गौतम मुख्य हुये।

इस प्रकार हम जानते हैं कि प्रवर से अभिप्राय श्रेष्ठता से है।

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