जन्मांग के द्वादश भाव से विचारणीय बातें – Vedic JyotishKrti Book Service Appointment
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जन्मांग के द्वादश भाव से विचारणीय बातें

:- कुण्डली के भाव का परिचय :-

ज्योतिष शास्त्र में जातक की कुण्डली का विवेचन ग्रहों की भाव में उपस्थिति,उसके प्रकृति,तत्व के साथ-साथ भाव के कारक-अकारक ग्रह एवं उनकी उछ-नीच के स्थिति के आधार पर किया जाता है।ग्रहों की भाव में उपस्थिति के साथ-साथ भाव से विचारणीय बातों का भी बोध अनिवार्य है,बिना भाव बोध के कुंडली का फल कह पाना कठिन है।आइये जाने जन्मांग के द्वादश भावों से किन-किन बातों का विचार किया जाता है।

प्रथम भाव-मुख्यतः प्रथम भाव को तन भाव देह भाव या लग्न के नाम से जाना जाता है।प्रथम भाव से और भी कई बातों का विवेचन किया जाता है जैसे-शरीर,रंग-रूप,आकृति,यश,विवेकशक्ति,प्रवास,तेज,बल,प्रारब्ध योग, जिज्ञासा,   मस्तिष्क, स्वभाव, प्रतिष्ठा, निद्रा, दादी, व्यक्तित्व, शारीरिक चिह्न, रोगरोधक क्षमता आदि…..
द्वितीय भाव-द्वितीय भाव से मुख्यतः धन के साथ-साथ परिवार,कुटुंबसुख,विद्या,भोजन,चल-सम्पदा,वाणी,दृष्टि,दाहिना नेत्र,कान-नाक, संचित पूँजी, क्रय-विक्रय, स्वाद और सत्य का विवेचन किया जाता है।
तृतीय भाव-कुण्डली के तृतीय भाव से जातक के पराक्रम के साथ-साथ छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, सुख-दुख, हस्ताक्षर, हाथ, मित्रता, रहन-सहन, माता-पिता, यश-अपमान, बंधु-बांधव, सहोदर, गुप्त शत्रु, खाँसी, दमा, मरण, कर्म और श्रम के साथ-साथ अचल सम्पदा आदि का विवेचन किया जाता है।
चतुर्थ भाव-चतुर्थ भाव को मातृ भाव से जाना जाता है,इसके अतिरिक्त चतुर्थ भाव से विद्या,मातृ सुख-दुख,कृषिकर्म,पशुपालन,जमीन-जायदाद, नव-निर्माण, ऐश्वर्य, कीर्ति, वाहन-योगहृदय, फेफड़ा, श्वसन-अंग, पिता के संस्कार के साथ-साथ नैतिक चरित्र और जातक की प्रवृत्तियों का आकलन किया जाता है।
पंचम भाव-जन्मांग के पांचवे भाव से मुख्यतः विद्या और सन्तान का विचार किया जाता है।इसके अलावा पंचम भाव से बुद्धि, विवेक, मंत्र विद्या, राजनीति, सट्टा, लेखन,वाक्पटुता, उदार, जिगर, आमाशय, गर्भधारण के साथ-साथ प्रतिष्ठा का भी विचार किया जाता है।
षष्ठ भाव-मुख्यतः छठा भाव शत्रु,रोग और ऋण से संबन्धित है,इसके अलावा मामापक्ष,  कारागर, रोग, मुकदमा, विवाद, चिंता, शंका, दुर्घटना, स्वजन-विरोध, कमर, पैर के साथ-साथ धोखा और मन-संताप का विचार किया जाता है।
सप्तम भाव- सातवें भाव से स्त्रीऔर विवाह का विचार किया जाता है, इसके अलावा ट्री का रूप-रंग, स्वभाव, गुण, स्त्री सुख, लाभ-हानि, व्यापार, न्यायालय, साझेदारी, काम, वासना, जीवनसाथी की आयु, दाम्पत्य-जीवन, शत्रुओं पर विजय, युद्धक्षेत्र, मुकदमा आदि के साथ-साथ मूत्राशय स्थान और चिह्न, संरचना आदि का विचार किया जाता है।
अष्टम भाव-आठवें भाव से आयु का विचार किया जाता है, इसके अलावा आकस्मिक धनलाभ, रिश्वत,ससुराल से लाभ, चिंता, शत्रु, गुप्त रोग-विकार, सर्पदंश, आपदाएँ, भूत-प्रेत विचार, खनन कार्य, जलयात्रा के साथ-साथ मृत्यु और यात्राओं के संकट का विचार किया जाता है।
नवम भाव- नवें भाव से भाग्य का विचार किया जाता है, इसके साथ-साथ जलयात्रा, वायुयात्रा, धर्म, पाप-पुण्य का विवेक, उदारता, दान, दैविक शक्ति, यन्त्रमन्त्र साधना, ज्ञानपिपासा, तीर्थाटन, शासन, ज्योतिष,आदर्श पिता और पुत्र का विचार किया जाता है।
दशम भाव-कुण्डली के दशम भाव से मुख्यतः कर्म का विवेचन किया जाता है, इसके अलावा पिता का काम, रंग, वृत्ति, गुण, स्वभाव, आयु, नौकरी, व्यापार, पिता का सुख, कर्म सिद्धि, अनुशासन, पद-लाभ, विरासत, विदेश प्रवास, उत्थान-पतन एवं स्वप्न का विचार किया जाता है।
एकादश भाव-एकादश भाव से आय का विचार किया जाता है,इसके अलावा धनागम लाभ,मित्रसुख,बड़े भाई-बहन,वाहन लाभ-हानि, मशीनरी कार्य, मेल-मिलाप,आकस्मिक लाभ, क्रिया-कुशलता, आभूषण, ऐश्वर्य के साथ-साथ कर्मकाण्ड एवं देवोपासना का विचार किया जाता है।
द्वादश भाव-बारहवें भाव से व्यय का विचार किया जाता है।इसके अलावा दूर की यात्रा, बायाँ नेत्र, अपव्यय,ऋण, अपयश, मुकदमा, द्रव्य हानि,विदेश भ्रमण,प्रवास के साथ-साथ मोक्ष(मरने के बाद प्राणी की गति) का चिंतन किया जाता है।
कुण्डली के भावों से ज्ञातव्य बातों को ध्यान में रखते हुये उनमे उपस्थित ग्रह आदि के आधार पर कुण्डली का फलादेश होता है।

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