गोत्र के शाखा और सूत्र

:-गोत्र के शाखा और सूत्र से अभिप्राय:-

पिछले भाग में हमने गोत्र और वेद और उपवेद के सन्दर्भ में जानकारी हासिल की,आज हम गोत्र की शाखा और सूत्र से क्या अभिप्राय है इसको जानने का प्रयास करेंगे।

शाखा-जैसा की हमने जाना कि वेद पाठ का अध्ययन हर किसी को आवश्यक है,परन्तु चारों वेद के अध्ययन की कठिनता को देखते हुये किसी एक वेद के अध्ययन का आदेश हुआ,परन्तु उसके अध्ययन में भी आने वाली परेशानियों के कारण वैदिक परंपरा को जीवित रखने हेतु ऋषियों ने शाखाओं का निर्माण किया,इस प्रकार प्रत्येक गोत्र के लिये अपने वेद की किसी शाखा विशेष का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया।जैसे-शांडिल्य गोत्र वालों के लिये सामवेद की कौथुमी शाखा का अध्ययन अनिवार्य है।इसी प्रकार हर गोत्र को उनके वेद की विशेष शाखा का अध्ययन निर्धारित किया गया।

सूत्र- सूत्र शाखाओं से भी सूक्ष्म होते हैं,जब गोत्र के अनुयायियों के लिये शाखा का अध्ययन भी कठिन होने लगा तो बाद के ऋषियों ने उन शाखाओं के भाव को सूत्र रूप में परिणित किया।जिसके फलस्वरूप ब्रह्मसूत्र,कात्यायन,गोभिल,शांडिल्य,बौधायन,पारास्कर,गृह सूत्र आदि का निर्माण हुआ।जैसे- शांडिल्य गोत्र वालों के लिये गोभिल सूत्र का निर्माण हुआ।प्रत्येक गोत्र के अनुयायी को अपने सूत्र की जानकारी रखना परम आवश्यक है।

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